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उत्तराखंड का इतिहास (भाग 3) – मध्यकाल (भाग 3)

43. भीष्म चंद (1555-1560 ई०)-

भीष्म चंद अकबर के समकालीन शासक था।यह अपने बुढ़ापे में शासक बना था।इसे यह भय था की बाहरी लोग आक्रमण न कर दे इसी के चलते इसने अपनी राजधानी राजबुंगा से अल्मोड़ा स्थानांतरित करने की योजना बनाई।इस समय अल्मोड़ा में एक खस राजा गजबुंरिगा का शासन था इसलिए इस क्षेत्र को खसिया खाला कहा जाता था।इसने बालों कल्याण चंद को गोद लिया था और उसको अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।भीष्म चंद के द्वारा बालों कल्याण चंद को डोटीयो से युद्ध करने के लिए भेजा था।भीष्म चंद ने अपनी राजधानी को चम्पावत से अल्मोड़ा (खगमरा कोट)स्थान्तरित करने की योजना बनाई और भीष्म चंद अल्मोड़ा में खगमरा कोट का किला बनवाया था।इसी दौरान खस सरदार गजबूटिंगा ने भीष्म चंद की हत्या कर दी और खगमरा कोट पर अधिकार कर लिया था।

44. बालों कल्याणं चंद (1560-1568 ई०)-

बालो कल्याण चंद द्वारा चंद वंश का विस्तार किया गया था। यह भीष्म चंद का दत्तक पुत्र था।भीष्म चंद ने इसे तारा चंद से गोद लिया था। इसने सबसे पहले अपने पिता के हत्यारे गजंबुरिया की हत्या की और अपनी राजधानी को राजबुंगा से खगमरा स्थानांतरित की थी। इसके अलावा इसने 3 किले बनवाये थे ।इसने अल्मोड़ा में नैपोखर नामक किले का निर्माण करवाया था।बालो कल्याण द्वारा गंगोली का क्षेत्र जीत लिया था और बागेश्वर के दानपुर पर अपना अधिकार कर लिया था।बालो कल्याण ने अल्मोड़ा में अनेक जातियों (जोशी,मेहरा,फड़तियाँ) आदि को जगिरे दी।इसने अल्मोड़ा में लालमण्डी किले का निर्माण कराया था। इस किले को पोर्टमेयर किला भी कहा जाता है।इसने डोटी के राजाओं के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किये थे।इसने डोटी के राजा हरी मल्ल की पुत्री से विवाह किया था और हरिमल्ल के द्वारा दहेज के रूप में सोर का क्षेत्र बालोकल्याण को दिया था।

45. रुद्रचंद (1568-1597 ई०)-

रुद्र चंद अकबर का समकालीन शासक था।इसके शासनकाल मे चंदो का शासन केवल पर्वतीय क्षेत्रों में था।रुद्रचंद के शासन काल मे 1568 में हुसैन ख़ाँ टुकड़ियां ने उत्तराखंड के तराई क्षेत्र मपर आक्रमण किया था।यह आक्रमण जम्मू कश्मीर में नियुक्त अकबर के सामंत हुसैन ख़ाँ ने किया और विजयी रहा था।इसके बाद हुसैन खाँ ने तराई पर बहुत लूट-पाट की थी।अकबर ने महाराष्ट्र में नागौर अभियान प्रारंभ किया था।तब हुसैन को वापिस बुला लिया था तभी रुद्र चंद ने पुनः तराई क्षेत्रो पर कब्जा कर लिया था।1575 में हुसैन ख़ाँ ने उत्तराखंड पर पुनः आक्रमण कर दिया था और फिर विजयी रहा था।तत्पश्चात हुसैन ख़ाँ गगौर अभियान में मारा गया।तीसरी बार अकबर के आक्रमण पर रूद्र चंद ने इक्का युद्ध किया। जिससे प्रसन्न होकर अकबर ने रुद्रचंद को अपने नागौर अभियान में शामिल किया।रुद्रचंद ने नागौर अभियान में अकबर का साथ दिया।इस युद्ध में रूद्र चंद बहादुरी से लड़ा,जिसके परिणाम स्वरुप अकबर नागौर अभियान में विजयी रहा।जिससे खुश होकर अकबर ने नौलखिया(84 माल परगना) ज़मीन रूद्र चंद को दान में दी तथा इसी ज़मीन पर रूद्र चंद ने रूद्रपुर नामक शहर बसाया था।रूद्र चंद ने बिर्बाल को अपना पुरोहित नियुक्त किया था।

इसकी जानकारी अकबर की आत्मकथा-आइनेअकबरी/अकबर नामा से मिलती है।

रुद्रचंद ने चम्पावत के बालेकेश्वर मंदिर का जिनोद्वार करवाया था।रुद्रचंद ने संस्कृत शिक्षा की शुरवात की थी।कशी और कश्मीर संस्कृत शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे।रूद्र चंद एक विद्वानी शासक था।इसने तीन पुस्तके लिखी थी।

  1. श्येनिक शास्त्र /श्वेन शास्त्र (यह पुस्तक आखेट कला से संबंधित थी)
  2. त्रेवेणिक धर्म निर्णय (यह पुस्तक धार्मिक प्रशासन से संबंधित थी)
  3. उषारुद्र गोइय (यह पुस्तक राजनितिक प्रशासन से संबंधित थी)

रूद्र चन्द्र ने अपने सेनापति पुरुषोत्तम पन्त की सहायता से रूद्र चंद ने सिरा पर विजय प्राप्त की,जिसके परिणाम स्वरूप अस्कोट,दारमा,जोहर का क्षेत्र चंद वंश में मिल गया था1590 में इसने मल्ल वंशीय शासक हरिमल्ल को पराजित किया था और थल पिथौरागढ़ में एक शिव मंदिर का निर्माण  किया था।1591में इसने पवार वंश के शासक बलभद्र शाह पर आक्रमण कर दिया था।इस युद्ध के दौरान कत्यूर शासक सूखल देव ने पवारों की सहायता की थी।रूद्र चन्द्र ने अपने सेनापति पुरुषोत्तम पन्त को  इस अभियान के लिए भेजा था। यह युद्ध चमोली के  ग्वालदम नामक स्थान में लड़ा गाया थाइसी कारण से इस युद्ध को ग्वालदम का युद्ध भी कहा जाता हैइस युद्ध के दौरान रूद्र चंद की सेना पराजित हुई और रूद्र चंद का सेनापति पुरुषोत्तम पन्त मारा गयाइसके बाद रूद्र चंद ने बैजनाथ का युद्ध लड़ा थायह युद्ध रूद्र चंद और कत्यूर शासक सूखल /यूकल देव के मध्य हुआ था।इस युद्ध में रूद्र चंद ने सूखल देव की हत्या कर दी और इस युद्ध में विजय रहा।इस युद्ध में गढ़वाल राजा ने  सूखल देव की सहायता नहीं की थी।

रूद्र चंद द्वारा मला महल का निर्माण कराया गया था।रुद्रचंद के दो पुत्र थे जिनके नाम शक्ति गोसाई तथा लक्ष्मी चंद था।शक्ति गोसाई जन्म से ही दृष्टिहीन था।इसे कुमाऊँ का धृतराष्ट्र कहा जाता है।शक्ति गोसाई ने ज़मीन नापने के लिए दो नयी प्रणाली चलाई।

  • मुठ्ठी प्रणाली
  • नाली प्रणाली
46. लक्ष्मीचंद (1597-1621 ई०)-

यह अकबर और जहाँगीर दोनों के समकालीन शासक थाइसने गढ़वाल राज्य के शासक मानशाह पर साट बार आक्रमण किया और सभी आक्रमणों में विफल रहा था।लक्ष्मी चंद के सेनापति गोडा सिंह ने आठवी बार गढ़वाल पर आक्रमण किया।इस समय गढ़वाल का सेनापति खत्तड़ सिंह था। गोडा सिंह और खत्तड़ सिंह के मध्य हुए इस युद्ध में गोडा सिंह विजयी रहा और इसने खत्तर सिंह कपर विजयी पाई थी इसी कारण से कुमाऊँ में खतडवा पर्व मनाया जाता है।लक्ष्मी चंद ने लखुली विराली के नाम से जाना जाता है।लक्ष्मी चंद ने अल्मोड़ा में लक्षमेंश्वर मंदिर का निर्माण कराया था।इसने नरसिंह बाड़े मंदिर का निर्माण करवाया था तथा 1602 में बागेश्वर में बागनाथ मंदिर का जिनोद्वार करवाया था।लक्ष्मी चंद का समकालीन मुग़ल शासक जहाँगीर था तथा जहाँगीर ने इसके शासन काल में हरिद्वार की यात्रा की थी।इसने पांडेखोला, कबीना, नरसिंहबाणी आदि बाग-बगीचों का निर्माण किया था।इसने राज्य कर्मचारियो को निम्न श्रेणी में बाँटा गया था-

  • सरदार – परगने का शासक
  • फौजदार -सेना का प्रमुख
  • नेगी – राज्य के छोटे कर्मचारी जिन्हें नेग (दस्तूर) मिलता है

राजनैतिक व्यवस्था को मजबूत करने हेतू लक्ष्मी चंद द्वारा निम्न स्थापनाए की जाती है

  • इसने राजधानी में बंदोबस्ती कार्यालय की स्थापना की थी
  • इसने बीस्टाली (सैन्य मामलो की कचहरी) की स्थापना की थी
  • इसने न्योवली कार्यालय की स्थापना की थी

लक्ष्मी चंद के 5 पुत्र थे

  1. दिलीप चंद
  2. विजय चंद
  3. त्रिमल चंद
  4. नारायण चंद
  5. नीला/नीलू/नीलू चंद गोसाई

47. दिलीप चंद (1621-1624 ई०)-

दिलीप चंद के समय गंगोली में पंतो तथा उप्रेतियों ने विद्रोह किया थाइसकी मृत्यु टी.बी./शयरोग से हुई थीराजा के सलाहकार सकराम कार्की तथा पीरु गोसाई इस समय षड़यंत्रों में व्यस्त थेइस कारण विजय चंद राजा बन गया था

48. विजय चंद (1624-1625 ई० )-

यह एक विलासी राजा थाइसके समय में सत्ता का वास्तविक नियंत्रण सकराम कार्की तथा पीरु गोसाई के हाथ में थाइन्होने जहर देकर विजय चंद की हत्या क्र दी और इन्होने नीलू गोसाई की आँखे निकाल ली थी।इस वक्त त्रिमल चंद गढ़वाल भाग गया।इस समय गढ़वाल का शासक श्याम सिंह था।इसी समय नारायण चंद ने भागकर डोटी(नेपाल) में शरण ली थी।

49. त्रिमल चंद (1625-1638 ई०)-

त्रिमल चंद को गढ़वाल राज्य से बुलाकर राजा घोषित किया गया थात्रिमल चंद ने सबसे पहले सकराम कार्की  व अन्य दरबारियों को मरवा दिया थात्रिमल चंद ने नीलू कठायत के वंशज कर्ण कठायत नामक वय्व्क्ति को रसोई का दरोगा नियुक्त किया था

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