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उत्तराखंड का इतिहास (भाग 3) – मध्यकाल (भाग 2)

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26. डमरूचंद (1303-1321 ई०)
27. धर्मचंद (1321-1344 ई०)
28. अभय चंद (1344-1374 ई०)-

यह चंद वंश पहला शासक था जिसके लिखित प्रमाण प्राप्त हुए है।यह मुहम्मद बिन तुग़लक़ का समकालीन शासक था।इसके बेटे का नाम ज्ञान चंद था।

29. ज्ञान चंद या गरूड़ ज्ञान चंद (1374-1419 ई०)-

यह कुमाऊँ की गद्दी पर सबसे लम्बे समय तक बैठने वाला शासक था।ज्ञान चंद के सेनापति का नाम नीलू कठायत था।1375 में ज्ञान चंद पर जब रोहलो का आक्रमण हुआ था तब ज्ञान चंद के सेनापति नीलू कठायत ने रोहलो का बहुत बहादुरी से सामना किया तथा उनको पराजित किया था।जिसके चलते नीलू कठायत को ज्ञान चंद ने कुमैय्या खिल्लत की उपाधि दी थी।इसकी बहादुरी की वजह से इसे कुमाऊँ का माधों सिंह भंडारी कहा गया।इसके साथ ही नीलू कठायत को ज्ञान चंद ने रौत भूमि (वीरता के लिए सैनिको को दान में दी जाने वाली भूमि) दान में दी थी।नीलू कठायत को उत्तराखंड में राजभक्त के रूप में जाना जाता है।ज्ञान चंद का एक मित्र कस्समलेखी था।जो नीलू कठायत का विरोधी था।नीलू कठायत ने कस्समलेखी की हत्या कर दी थी।जिससे क्रोधित होकर ज्ञान चंद ने नीलू कठायत की हत्या करवा दी और इसके दोनों बेटों को आखें फोड़ दी थी।नीलू कठायत की मृत्यु के बाद ज्ञान चंद पर फिर रोहलो ने 1416 में आक्रमण किया तथा ज्ञान सनद की सेना रोहलो के सामने कमजोर पड़ गयी,जिसके चलते ज्ञान चंद दिल्ली के शसक फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ से मिलने तथा मदद मागने दिल्ली गया था तथा यह चंद वंश का पहला ऐसा शासक था जो दिल्ली के तुग़लक़वंश के दरबार में गया था। फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने ज्ञान चंद को गरुड़ की उपाधि दी तथा तराई भाभर क्षेत्र भी ज्ञान चंद को दे दिया था।गरुड़ की उपाधि के कारण कुछ इतिहासकार ज्ञान चंद को विष्णु का उपासक मानते है।ज्ञान चंद ने अपना राज्य चिन्ह गरुड़ बनाया था।डोटी राज्य पर अभियान चलाने वला यह पहला राजा था।

30. हरिहरचंद या हरिचंद (1419-1420 ई०) –

यह ज्ञान चंद का पुत्र था तथा इसका शासन काल केवल एक वर्ष का ही था।

31. उद्यान चंद (1420-1421 ई०)-

यह हरिचंद का पुत्र था।नीलू कठायत को मारने तथा उसके बेटों की आखें फोड़ने में उद्यान चंद भी शामिल था।बाद में पछतावा हुआ तो आगे चलकर इसने युद्ध नीति छोड़कर धार्मिक राजा के रूप में विख्यात हुआ।उद्यान चंद ने चम्पावत में  बालेश्वर मंदिर का निर्माण कराया था।इस मंदिर में निर्माण में एक ब्राहमण कुंज शर्मा तिवारी ने इसकी सहायता की थी।

32. आत्मचंद-(द्वितीय) (1421-1422 ई०)
33. हरिचंद (द्वितीय) (1422-1423 ई०)
34. विक्रम चंद (1423-1437 ई०)-

विक्रम चंद अपने शासन के अंतिम दिनों में एक विलासी राजा हो गया था।जिसके चलते जनता इसका विराध करने लगी थी।इसका सबसे बड़ा विरोधी इसी का भतीजा भारती चंद था।बालेश्वर मंदिर से विक्रम चंद का एक ताम्र पत्र प्राप्त हुआ है।

35. भारती चंद (1437-1450 ई०)-

भारती चंद चंद वंश का एक शक्तिशाली शासक था।भारती चंद ने डोटी के राजाओ को कर देने से मना कर दिया था और स्वयं को एक स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया था।इससे पहले के सभी शासक माण्डलिक राजा थे।डोटी(रेकाओं) के राजा जयमल ने चंदो पर आक्रमण कर दिया था।डोटी एक बड़ा राज्य था इसी कारण से यह युद्ध 12 वर्षो तक चला।इसी युद्ध के दौरान कटिहर के राजा ने भारती चंद की सहायता की और भारती चंद इस युद्ध में विजयी हुआ।इस युद्ध के दौरान भारती चंद ने एक नयी कट्टकाली प्रथा(बिना शादी के किसी भी औरत को अपने घर रख लेना)चलाई गयी।जिसके परिणाम स्वरुप एक नयी जाती की उत्पत्ति हुई।जिसे नयक्ल नीति कहा गया।जो चंद सैनिको की अवैध संताने थी।इन्हें समाज में हीन भावना से देखा जाता था।बाद में 1929 में नैनीताल में नायक समाज सुधार समिति की स्थापना की गयी जिससे नायक जाति को मुख्य धारा में शामिल किया गया।भारती चंद के शासन के अंतिम वर्षो में भारती चंद की सेना कमजोर पड़ने लगी,जिसके चलते भारती चंद के पुत्र रत्न चंद ने कटहर राजाओं से सहायता लेकर अपने पिता की मदद की और डोटी में दूंगाबसेड़ा नामक व्यक्ति को अपना सामंत नियुक्त किया।भारती चंद अपने बेटे की बहुदारी से खुश होकर 1450 में रत्न चंद सिंहासन पर बैठा दिया।

36. रत्न चंद (1450-1488 ई०)-

रत्न चंद चंदवश  का पहला शासक था जिसने भूमि बंदोबस्त कराया ,और जैन्दाकिरात को पहला बंदोबस्त अधिकारी नियुक्त किया था।रत्न चंद ने मल्ल वंश के शासक नाग मल्ल की पराजित किया था।रत्न चंद ने सर के शासक बम रजा को भी पराजित किया था।रत्न चंद ने अपने समकालीन राजाओं को हराया तथा कर भी वसूला।इसके समकालीन राजा  खड़क सिंह,जगनाथ भट्ट,राजा सुर सिंह मेहरा थे।रत्न चंद एक दानी शासक था जिसने एक  गाँव दान में दिया था।रत्न चंद ने जागेश्वर में धर्मशालाओ का निर्माण करवाया था।

37. र्कीति चंद (1488-1503 ई०)-

कीर्ति चंद रत्न चंद का पुत्र था।यह गढ़वाल के शासक अजय पाल के समकालीन था।इसके दरबार में एक नागा सिद्ध बाबा आया और उसने कहा जहाँ तक तेरे बाजे (ढ़ोल) की आवाज जाएगी वहाँ तक तेरा राज्य का विस्तार होगा।इसी राज्य विस्तार की चाहमें कीर्ति चंद युद्ध करता रहा इसलिए इसे चंदो में युद्ध प्रिय राजा कहा गया है।यह पहला राजा था जिसने गढ़वाल में /पावरो में/अजयपाल में आक्रमण किया और जीता था।डोटी ने चंदो पर फिर आक्रमण किया तथा डोटी को पराजय का सामना करना पड़ा।इसने जसपुर के निकट कीर्तिपुर नगर की स्थापना की थी।कीर्ति चंद ने बाराध्मंडल(अल्मोड़ा), पाली पछाऊ(द्वाराहाट), फलदाकोट(कोटद्वार), विसोद(अल्मोड़ा), सीयूनरा(अल्मोड़ा) आदि जगहों में अपना राज्य का विस्तार किया था।अजयपाल और कीर्ति चंद के मध्य दो युद्ध हुए पहले युद्ध में कीर्ति चंद जीता परन्तु दुसरे युद्ध में अजयपाल विजयी रहा।

38. प्रताप चंद (1503-1517 ई०)
39. तारा चंद (1517-1533 ई०)
40. माणिक चंद (1533-1542 ई०)-

माणिक चंद के समय दिल्ली में शूर वंश का शासन था।इस्लाम शाह शूर इस समय दिल्ली में शासन कर रहा था।माणिक वंश के शय शूर वंश के विरोधी ख्बास खांने उत्तराखंड में शरण ली थी।

41. कल्याण चंद (तृतीय) (1542-1551 ई० )
42. पुनीचंद (पूर्णचंद) (1551-1555 ई०)
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