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उत्तराखंड का इतिहास (भाग 2) – प्राचीन काल (भाग 3)

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पौरव वंश/ पर्वताकार वंश (Paurava Dynasty / Parvatakaar Dynasty)-

हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद उत्तराखंड में सत्ता का विकेंद्रीकरण हो गया तथा तीन बड़े राज्यों का उदय हुआ। इसमें से ब्रह्मपुर राज्य सबसे बड़ा था।ब्रह्मपुर राज्य में ही पौरव वंश का उदय हुआ था।

जानकारी के स्त्रोत –

1915 में अल्मोड़ा के तालेश्वर/भिक्यासेन नामक स्थान से ताम्र व अष्टधातु के अभिलेख प्राप्त हुए है।इन अभिलेखों में पौरव शासको का उल्लेख है।

  1. विष्णु वर्मन
  2. वृष वर्मन
  3. अग्नि वर्मन

अग्नि वर्मन के दो पुत्र थे

  1. ध्रुती  वर्मन
  2. विष्णु वर्मन (द्वितीय)

हुवेनसांग की यात्रा वर्णन में भी पौरव वंश की जानकारी मिलती है।इसके अनुसार पौरव वंश की राजधानी ब्रह्मपुर थी।पौरव वंश के राजा का पद वंशानुगत था।

उपाधि- परमभट्टारक महाराजाधिराज

ये ब्राहमण धर्म को मानते थे और खुद को ब्राहमणहितेशी कहलाना पसंद करते थे।इनके अराध्य देवता बिनसर महादेव थे।इन्हें सोमवंशीय माना जाता था।पौरव वंश में राजा का पद सर्वोच्य था।राजा जिस स्थान पर अपने परिवार के साथ रहता था उसे कोट कहते थे।कोट को ही पौरव वंश की राजधानी कहा जाता था।यह उत्तराखंड का पहला राजवंश था जिसने उत्तराखंड में प्रशासन की नींव रखी थी।

उत्तराखंड में पौरव वंश में ही राजस्व के लिए सबसे पहले कर वसूली की थीइस कर में उपज का 1/6 भाग लिया जता थाकर वसूलने वाले अधिकारी को भाविक कहा जाता था भूमि को 2 भागों  में विभाजित किया गया था

  1. केदार भूमि (सिंचित भूमि) [जो भूमि उपजाऊ हो]
  2. सारी भूमि (असिंचित भूमि) [जो भूमि अपेक्षाकृत कम उपजाऊ हो ]
पौरव वंश का मंत्री मंडल-
  • सर्वोच्च पद – राजा
  • आमात्या – राजा का सहायक (प्रधानमंत्री)
  • कुमार – राज कुमार / राजा का बेटा (प्रधानमंत्री का सहायक)
  • बालात्यक्ष – सेनापति
  • संधि विग्रह – राज्यों के बीच संधि कराने वाला
  • कोराधिकारी – राजधानी की सुरक्षा करने वाले अधिकारी
  • प्रतिहार-  ये राजपरिवार को सुरक्षा देते थे
  • कारगिक – राजा तक जनता के मुद्दे पहुचने वाला
  • दंडपासिक/ कटुक – पुलिस अधिकारी
  • सुपकारपति – रसोइया

पौरव वंश की सेना को 3 भागों में बात गया था-

  1. गज सेना (गजपति)
  2. अश्व सेना (अश्वपति)
  3. पैदल सेना (जनपति)

माना जाता है कि कन्नौज के शासक यशोवर्मन द्वारा हिमालय के तराई क्षेत्रो में किये गये सैन्य अभ्यासों में यह वंश समाप्त हो गया था

  • गोविबाण- कनिन्हाम के अनुसार इस राज्य में नैनीताल जनपद के तराई भाभर प्रदेशो के अतिरिक्त पीलीभीत एवं रामपुर जनपद भी थे
  • कल्याण वर्मन का राज्य- इसकी जानकारी पलेठी के सूर्य मंदिर(टिहरी) से मिलती है।पलेठी को ही कल्याण वर्मन की राजधानी माना जाता है।टिहरी के देवप्रयाग के आस-पास गंगा के तटवर्ती प्रदेशो में कल्याण वर्मन का राजवंश शासन कर रहा था।
  • स्वर्ण गौत्र देश- यह राज्य ब्रहमपुर राज्य के उत्तर में स्थित था।यह राज्य पूर्वी स्त्रीराज्य भी कहलाता था।इस राज्य को कश्मीर के कार्कोटवंश के शासक ललितादित्य मुक्तापीठके द्वारा जितने का उल्लेख मिलता है।
  • शत्रुघन राज्य- हुवेनसांगके अनुसार इसकी पूर्वी सीमा पर गंगा बहती थी तथा उत्तर में ऊँचे पर्वत स्थित थे।

यशोवर्मन तथा ललितादित्य के उत्तराखंड पर आक्रमण-

यशोवर्मन कन्नौज (कन्याकुब्ज) का राजा था।यशोवर्मन ने उत्तराखंड में एक सामंत वसंतदेव को नियुक्त किया था।कश्मीर में एक कार्कोट वंश था। जिस पर एक शक्तिशाली राजा ललितादित्य मुक्तापीठ का शासन था।जिसकी जानकारी हमे कल्ह्ड द्वारा रचित राजतंरगिणी से मिलती है। इतिहासकारो के अनुसार यशोवर्मन ने उत्तराखंड के राज्यों पर अधिकार कर लिया था।यशोवर्मन ने ललितादित्य के साथ मिलकर भोट राजाओ को हराया था।इसके पश्चात् ललितादित्य ने यशोवर्मन को भी पराजित कर दिया था।जिससे ब्रहमपुर राज्य भी ललितादित्य के अधीन हो गया था,परन्तु ललितादित्य ने उत्तराखंड में शासन नहीं क्या था तथा शासन वापिस यशोवर्मन को दे दिया था।ललितादित्य द्वारा उत्तरखंड विजय के कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले है।

गोपेश्वर की सीमा में एक स्थल करगिरी हाट स्थित है।यह माना जाता है कि चमोली के जोशीमठ में नरसिंह मूर्ति की प्रतिस्थापना ललितादित्य ने की थी।ललितादित्य ने यशोवर्मन के सामंत बसंत देव से युद्ध इसलिए नहीं किया था क्योंकि वह एक शासक ना होकर सामंत था।बाद में यशोवर्मन की मृत्यु के बाद बसंत देव ने खुद को राजा घोषित कर दिया था,तथा एक नए राज्य की स्थापना कर दी जिसे कत्यूरी वंश कहा जाता है।

कत्यूरी वंश (Katyur Dynasty)[750-1050A.D.]-

कत्यूरी वंश उत्तराखंड में राज करने वाला सबसे महत्वपूर्ण वंश था। इस वंश ने उत्तराखंड में पहली बार राजनैतिक एकता स्थापित कि थी। यह मध्य हिमालय का पहला ऐतिहासिक राजवंश था। इस वंश को उत्तराखंड का स्वर्ण काल कहा जाता है। यशोवर्धन की मृत्यु के बाद सामंत बसंतदेव ने खुद को स्वतंत्र कहकर राजा घोषित कर दिया था,तथा एक नए राज्य की स्थापना की थी जिसे कत्यूरी वंश बोला गया। जिसे कार्तिकेयपुर राजवंश भी कहा जाता है।यह एक धर्म राजवंश था। इस काल में बड़े-बड़े विद्वानों को आश्रय दिया गया था।शंकराचार्य का उत्तराखंड आगमन कत्यूरी वंश के समय ही हुआ था। इसी वंश ने बद्रीनाथ तथा केदारनाथ मंदिरों का पुनः उद्धार कराया और ज्योतिर्मठ की स्थापना की थी।सर्वाधिक मंदिरों का निर्माण इसी काल में हुआ था।

  • भूदेव ने बैजनाथ मंदिर का निर्माण किया था।
  • ईष्टगड ने नव दुर्गा लकुलीश तथा नटराज के मंदिर का निर्माण किया था।

कत्यूरी शासक शैव सम्प्रदाय के अनुयायी थे क्योंकि इनके निर्मित सभी मंदिर शैव धर्म से सम्बन्धित है। रुद्रप्रयाग के कालीमठ से प्राप्त हरगौरी की मूर्ति को राहुल सांकृत्यायन ने कत्यूरी काल की सबसे महतवपूर्ण कीर्ति कहा है।इसी कारण राहुल सांकृत्यायन ने इस काल को उत्तराखंड का स्वर्ण काल कहा है।

जानकारी के स्त्रोत-

    • भूदेव का बैजनाथ अभिलेख।
    • त्रिभुवन राजदेव का बागेश्वर अभिलेख ।
    • ललितसूर देव का पाण्डुकेश्वर का ताम्र अभिलेख।
    • ललितसूर देव का कण्डारा ताम्र लेख अभिलेख।
    • देशत देव का बालेश्वर अभिलेख।
    • पदमदेव का पाण्डुकेश्वर ताम्र लेख अभिलेख।
    • कालीमठ से प्राप्त हरगौरी की मूर्ति।
    • सुभिक्ष राजदेव का पाण्डुकेश्वर ताम्र लेख अभिलेख।

प्राचीन लोक गाथाए एवं जागर से भी कत्यूरी राजवंश कि जानकारी मिलती है। कत्यूरी कालीन स्मारक एवं कला कृतियाँ भी कत्यूरी वंश की जानकारी देती है।

कत्यूरी वंश की सीमा-

  • मध्य हिमालयी क्षेत्र
  • सतलुज से काली नदी के बीच में

कत्यूरी वंश के लोग वैश धर्म को मानते थे।कत्यूरी वंश की पहली राजधानी कार्तिकेयपुर (जोशीमठ के समीप)थी,जिसको बाद में बदल कर बैजनाथ कर दी गयी थी। राजधानी परिवर्तनका मुख्य कारण जोशीमठ के क्षेत्र में होने वाले हिमस्कलन और भुस्कलन की समस्या थी।इस वंश की राजभाषा संस्कृत थी। इस वंश की लोक भाषा पाली थी। इनकी लिपि देवनागिरी थी।

कत्यूरी वंश की उत्पत्ति-

  • इतिहासकार लक्ष्मी दत्त जोशी के अनुसार कत्यूरीअयोध्या के मूल निवासी थे।अयोध्या से सालिवाहन नामक सूर्यवंशी राजकुमार कत्यूर घाटी में आकर निवास करने लगे थे,इसी कारण इन्हें के वंशज कत्यूरी कहलाये।
  • डॉ. शिव प्रशाद डबराल के अनुसार कतुरी खस प्रजाति के लोग थे। इसका प्रमाण कत्यूरी व खसों की सामाजिक स्थिति में काफी समानता से मिलता है। उत्तराखंड के राजपूत खसों व कत्यूरी के वंशजो को निम्न स्तर का मानते थे।
  • ई.एटकिन्सन के अनुसार कत्यूरी मध्य एशिया के कटोर जाति के वंशज थे।
  • राहुल संस्क्रत्यान के अनुसार कत्यूरी वंश शको तथा कुषाणों से सम्बंधित थे।इसके प्रमाण हमे शको में प्रचलित कटारमल के सूर्य मंदिर की वूटधारी मूर्ति से मिलता है।

संस्थापक-

  • अभिलेखो के अनुसार – बसंत देव
  • जनस्तुतियों के अनुसार – बासुदेव
  • राहुल संस्क्रत्यान के अनुसार – बसंत देव और वासुदेव को एक ही माना गया है।

बसंत देव का वंश-

बसंत देव ने कत्यूरियो के प्रथम शाखा की स्थापना की थी। बसंत देव प्रथम स्वतंत्र शासक नहीं था। उसे यशोवर्मन के द्वारा उत्तराखंड का सामंत नियुक्त किया गया था। यशोवर्मन को कश्मीर के शासक ललिता द्वितीय मुक्तपीड द्वारा हरा दिया गया था। इस परिस्थिति का फायदा उठाकर बसंत देव ने स्वतंत्र कत्यूरी वंश की सथापना कर दी थी। बसंत देव की पत्नी का नाम राजनारायणी था।वैष्णव धर्म वालो को बसंत देव ने अग्रहार(मंदिर बनाने के लिए दी जाने वाली भूमि) दान में दी थी

उपाधि- परमभट्टारक महाराजाधिराज

अज्ञात-

इस राजा का पता नहीं चला।यह शैव धर्म को मानता था। 

उपाधि- परमभट्टारक महाराजाधिराज

खर्पर देव वंश-

कन्नौज के राजा यशोवर्मन का समकालिन था। 

कल्याण राज-

भूदेव के अभिलेख से कलायन राज की पत्नी लद्वा देवी की जानकरी मिलती है। 

त्रिभुवन राज देव-

त्रिभुवन राजदेव ने कोई भी उपाधि धारण नहीं की थीइसनेमंदिर बनाने को भूमि दान में दी थी। इसके द्वारा किरातो के साथ संधि करने की जानकारी प्राप्त होती है। इसी राजा के समय बंगाल के पाल वंश के शासक धर्मपाल ने आक्रमण किया था। 

निम्बर वंश(Nimbar Dynasty)-

पालो के आक्रमण के बाद निम्बर वंश कि स्थापना हुई थी।यह शैव धर्म को मानते थे।इसने जागेश्वर के मंदिर समूह का निर्माण करवाया था। निम्बर वंश को कार्तिकेयपुर का द्वितीय परिवार माना जाता है। निम्बर वंश के संस्थापक निम्बर देव थे। इस शासक ने कोई भी उपाधि धारण नहीं की थी।बागेश्वर शिलालेख में इसे निम्बरर्त कहा गया है।पाण्डुकेश्वर ताम्र लेख में इसे श्री निम्बरम कहा गया है।निम्बर वंश का सर्वाधिक उल्लेख पांडुकेश्वर (जोशीमठ) के ताम्रपत्र में मिलता हैं। पांडुकेश्वर ताम्रपत्र की भाषा – संस्कृत थी। निम्बर देव ने पहली बार राज्य का एकीकरण किया था। इसकी पत्नी का नाम दाशु जिन्हें नाथू देवी भी कहा जाता था।निम्बर देव को शत्रुहन्ता भी कहा गया है। निम्बर ने पालो से संधि की थी।

ईष्टगण देव-

इसने सम्पूर्ण उत्तराखंड का एकीकरण किया था। ललितसुर देव के ताम्र अभिलेख से इसे परममहेश्वर तथा परमब्राहमण उपाधियो से जाना जाता है। इसकी पत्नी का नाम धरा देवी था। इसको परमभट्टारक महाराजाधिराज की उपाधि से जाना जाता था।इन्होने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया था।
नटराज मंदिर
नवदुर्गा मंदिर
लकुलिश मंदिर
महेश मर्दिनी मंदिर
आदि मंदिरों का निर्माण इन्होने ही कराया था।

ललितसुर देव-

यह सबसे शक्तिशाली शासक थे।इसकी दो पत्नियां थी।जिनके नाम समा देवी और लया देवि था।पांडुकेश्वेर ताम्र पत्रलेख में इन्हें भगवान विष्णु के बाराह अवतार के समान बताया गया है।पांडुकेश्वेर ताम्र पत्रलेख में इसे गरुण भद्र की उपाधि दी गयी है।इनके पुत्र का नाम भूदेव था। चमोली में ललित भूदेव की पत्नी लया देवि के द्वारा नारायण का मंदिर बनवाया गया था।पाण्डुकेश्वर ताम्र पत्र लेख की रचना गंगाभद्र ने की थी।
उपाधि- परम महेश्वर परमभट्टारक महाराजाधिराज/ परम ब्राहमण

भूदेव-

भूदेव के बैजनाथ अभिलेख से कत्युर वंश की वंशावली के बारे में जानकारी मिलती है। भू देव को दान देने के लिए जाना जाता था। शंकराचार्य का अगमान भूदेव के काल में ही हुआ था। शंकराचार्य ने जोशीमठ की स्थापना की थी। 820 ईसवी में केदारनाथ में शंकराचार्य ने देह त्याग दिया था। भूदेव ने बैजनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था।भूदेव बौद्ध धर्म का विरोधी था इसलिए इसने बौद्ध श्रवण शत्रु की उपाधि धारण की थी।
उपाधि- परमभट्टारक महाराजाधिराज/ परम ब्राह्मण भक्त

 

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