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झारखण्ड का इतिहास (History of Jharkhand)

झारखण्ड का इतिहास


History of Jharkhand


मनु संहिता जो की एक प्राचीन हिन्दू ग्रंथ है, जिसके एक श्लोक में झारखंड की पौराणिक एवं सांस्कृतिक पहचान की झलक मिलती है।
‘अयस्क: पात्रे पय: पानम
शाल पत्रे च भोजनम्
शयनम खर्जूरी पात्रे
झारखंडे विधिवते।’

इस श्लोक का अर्थ है –

‘झारखंड में रहने वाले व्यक्ति धातु के बर्तन में जल (पानी) पीते ,शाल (एक वृक्ष) के पत्तों पर भोजन करते तथा खजूर की चटाई पर सोते हैं।’

झारखंड शब्द का अर्थ –

  • झारखंड शब्द का अर्थ – झार का अर्थ – जंगल या झाड़ वाला क्षेत्र तथा खंड का अर्थ टुकड़ा।
  • मुगलों के शासन काल में इस क्षेत्र को ‘कुकरा’ कहा जाता था।
  • ब्रिटिश शासन काल में इसका नाम बदल कर झारखंड नाम से जाना जाने लगा।
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार छोटानागपुर को वायु पुराण में मुरण्ड तथा विष्णु पुराण में मुंड कहा गया है।

झारखण्ड का उल्लेख –

  • महाभारत काल में छोटानागपुर पुंडरीक नामक एक देश था।
  • छोटानागपुर को पूर्व मधयकालीन संस्कृत साहित्य में कलिंद देश कहा जाता था।
  • 399 ई.में बौद्ध ग्रंथों की खोज में भारत आये चीनी यात्री फाह्यान के अनेक विवरण मिलता है। फाह्यान भारत में 411 ई. तक रहा था।
  • चीनी यात्री फाह्यान चंद्रगुप्त द्वितीय का शासन काल था।
  • फाह्यान ने छोटानागपुर को कुक्कुटलाड कहा था।
  • इसके अलावा चीनी यात्री युआन च्यांग (630-644), ईरानी धर्माचार्य मुल्ला बहबहानी(19वीं सदी), बिशप हीबर (1824 ई.), ईरानी यात्री अब्दुल लतीफ (1600 ई.), के यात्रा-वृत्तांतों में भी छोटानागपुर और राजमहल का जिक्र है।
  • मध्यकालीन इतिहास में यह चर्चा खास तौर से मसहुर है की खोखरा देश में हीरे और सोना काफ़ी अच्छी मात्रा में पाये जाते थे।
  • बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (हजारीबाग, अध्याय चार, पेज 65) में यह उल्लेख है की असुरों का राजा जरासंध अपने शत्रुओं को परास्त कर झारखंड के जंगलों में यह सोचकर छोड़ देता था की उन्हें खूंखार जंगली जानवरों अपना शिकार बनाकर खा जायेंगे।मुगलकालीन दस्तावेजों में झारखंड की ऐतिहासिक व पारंपरिक पहचान के प्रमाण मिलते हैं।
  • इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया नामक पुस्तक में झारखंड क्षेत्र की भौगोलिक पहचान कुछ इस प्रकार बताई गयी है – ‘छोटानागपुर इन्क्लूडिंग द ट्रिब्यूटरी स्टेट्स आफ छोटानागपुर एंड उड़ीसा ईज काल्ड झारखंड इन द अकबरनामा।’
  • मध्यकालीन युग में झारखण्ड एक ऐतिहासिक क्षेत्र के रूप में उभर कर आया।
  • 12वीं शताब्दी के नरसिंह देव (गंगराज के राजा) के शिलालेख में झारखंड का पहला उल्लेख मिलता है।
  • इस शिलालेख के अनुसार यह दक्षिण उड़ीसा में पाया गया है। जिसमें दक्षिण झारखंड का उल्लेख है।
  • इस शिलालेख के अनुसार उस वक़्त भी उत्तर झारखंड अस्तित्व में था, उस वक़्त उत्तर झारखण्ड उड़ीसा के पश्चिम पहाड़ी जंगल क्षेत्रों से लेकर वर्तमान के छोटानागपुर, संतालपरगना, मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश के पूर्वी भागों तक फैला हुआ था।
  • मध्यकालीन युग में उड़ीसा के पश्चिम क्षेत्रों के राजाओं को झारखंडी राजा कहा जाता था।
  • 15वीं सदी के अंत में एक बहमनी बादशाह ने झारखंड बादशाह या झारखंडी शाह की शीर्षक लिया था।
  • जिसका अर्थ यह है कि उस समय मध्य प्रदेश के भी कई जंगली क्षेत्रों को झारखंड के नाम से जाना जाता था।
  • प्राचीन काल में झारखंड से होकर कई मार्ग उड़ीसा, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश जाते थे।
  • इन सभी मार्गों से सेना, व्यापारी और तीर्थ यात्री अपना सफ़र पूरा करते थे।
  • इन मार्गों का वर्णन ‘चैतन्य चरितामृत’ में भी मिलता हैं।
  • कई इतिहासकारों के अनुसार शेरशाह व चेरों के मध्य जो युद्ध झारखंड के मार्ग को लेकर थी, वह मार्ग भारत को पश्चिम भारत से जोड़ता था।
  • मध्य काल के अंत के बाद झारखंड की विचारधारा एक क्षेत्र विशेष के रूप में कम होने लगी थी।
  • इसके पश्चात पंचेत से राजमहल तक का पूरा क्षेत्र झारखंड के नाम से जाना जानने लगा, इन क्षेत्रों में रोहतास के किले से राजमहल के गंगा किनारे तक का पूरा क्षेत्र शामिल था।
  • हिंदू धर्म के प्रचार करने के दौरान वैद्यनाथ धाम के ‘बाबा’ भी झारखंडी महादेव कहलाये गए थे।
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