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राजस्थान के किसान आन्दोलन (भाग – I)

राजस्थान के किसान आन्दोलन (भाग – I)


Farmers Movement of Rajasthan (Part – I)


राजस्थान में किसानों पर 84 प्रकार के कर लगाये जाते थे। इन्हीं में से प्रमुख ये चार प्रकार के कर लगाये जाते थे।

  1. कुंता 
  2. लाटा
  3. चंवरी कर
  4. तलवार बंधाई 

कुंता कर – खड़ी फसल में लगने वाले कर को कुंता कर कहते थे।

लाटा कर – फसल काटने के पश्चात होने वाले बटवारे को लाटा कर कहते थे।

चंवरी कर – पुत्री के विवाह में देने वाला कर को चंवरी कर कहा जाता था।

तलवार बंधाई कर (उत्तराधिकारी कर) – सामंत की मृत्यु के पश्चात नये उत्तराधिकारी के तलवार बाँधी जाती थी, तलवार बाँधने के पश्चात देने वाले कर को तलवार बंधाई कर कहा जाता था। यह कर राजस्थान के राजपूतों ने मुगलों से सिखा था। अजीत सिंह ने इसको हुकुमनाम नाम दिया था। जयपुर तथा उदयपुर में इसी कर को नजराना कहा जाता था। जोधपुर में इसे कैदखालसा या पैसकसी कहा जाता था।

बिजौलिया किसान आन्दोलन – (1897-1941) –

  • बिजौलिया किसान आन्दोलन 44 वर्षों तक चला था। यह भारत का सबसे लम्बा चलने वाला किसान आंदोलन था। यह भारत का अहिंसात्मक किसान आन्दोलन था।
  • बिजौलिया भीलवाड़ा में था। भीलवाड़ा मेवाड़ रियासत में आता था।
  • बिजौलिया किसान आन्दोलन के समय मेवाड़ के महाराणा फ़तेह सिंह थे।
  • बिजौलिया का प्राचीन नाम विजयावल्ली था।
  • महाराणा सांगा के युद्ध में उनकी सहायता करने वाले उत्तर प्रदेश के अशोक परमार को महाराणा सांगा ने बिजौलिया की जांगीर दी थी।
  • बिजौलिया ठिकाने के संस्थापक अशोक परमार थे।
  • बिजौलिया ठिकाने के सर्वाधिक धाकड़ जाति के किसान रहते थे।
  • बिजौलिया मेवाड़ के प्रथम श्रेणी का था।  यहाँ के सामंतों को रावत जी/ राव जी कहा जाता था।
  • किसान आंदोलन के समय यहाँ के ठाकुर कृष्ण सिंह थे।

बिजौलिया किसान आन्दोलन तीन चरणों में पूर्ण हुआ था।

  1.  1897 से 1915 – नेतृत्व – साधु सीताराम दास
  2. 1915 से 1923 – नेतृत्व – विजयसिंह पथिक
  3. 1923 से 1941 – नेतृत्व – माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाधाय, जमनालाल बजाज, रामनारायण चैधरी।

प्रथम चरण (1897 से 1915) –

1897 में बिजौलिया के एक गाँव गिरधारीपूरा के किसान गंगाराम धाकड़ के मृत्युभोज पर समस्त गाँव एकत्रित हुआ था। सभी किसान 84 प्रकार के करों से परेशान थे। साधु सीताराम ने सुझाव से सहमती हुई की ठिकानेदार कृष्णसिंह की शिकायत मेवाड़ के महाराणा से की जाएगी। इसके पश्चात नानजी पटेल ठाकरी पटेल को उदयपुर भेजा गया था। मेवाड़ के महाराणा फतेहसिंह ने भी कृष्णसिंह के उप्पर कोई कार्यवाही नहीं की थी।

  • प्रथम चरण का नेतृत्व साधु सीताराम दास द्वारा किया गया था।
  • शिकायत के पश्चात महाराणा फतेहसिंह ने हामिद हुसैन को निरिक्षण के लिए बिजौलिया के ठिकानेदार कृष्णसिंह के पास भेजा था।
  • इसके पश्चात कृष्णसिंह ने 1903 में  एक और चंवरी कर लगा दिया था। पुत्री के विवाह में 5 कर में देने हुंगे। कर लगने के बाद 2 साल तक किसी भी लड़की का विवाह नहीं हुआ था। 1905 में कृष्णसिंह ने इस कर को हटा दिया था।
  • 1905 में कृष्णसिंह की मृत्यु के पश्चात पृथ्वीसिंह बिजौलिया का ठिकानेदार बना था।
  • पृथ्वीसिंह ने एक नया तलवार बंधाई कर (उत्तराधिकारी शुल्क) लगाया था। यह कर किसान ठिकानेदार को देते थे।
  • 1915 में पृथ्वी सिंह द्वारा साधु सीताराम दास व इसके सहयोगी फतहकरण चारण ब्रह्मदेव को बिजौलिया से निष्कासित कर दिया।

द्वितीय चरण (1915 से 1923) –

  • द्वितीय चरण का नेतृत्व विजयसिंह पथिक ने किया था।
  • विजयसिंह पथिक बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) के थे।
  • इनका वास्तविक नाम भूपसिंह गुर्जर था।
  • भूपसिंह गुर्जर ने एक योजना बनाई जिसमे इन्होने कहा हम 1857 जैसी एक और क्रांति करेंगे जिसका नाम सशस्त्र क्रांति था।
  • इस क्रांति की जानकारी जब ठिकानेदार को मिली तो भूपसिंह की गिरफ़्तार कर टॉडगढ़ जेल में डाल गिया गया था।
  • इसके पश्चात भूपसिंह जेल से फ़रार होकर चित्तौड़ के एक गाँव चले गये तथा इन्होने अपना नाम व व्यवसाय बदल लिया था।
  • भूपसिंह ने अपना नाम विजयसिंह पथिक व अपना व्यवसाय आध्यापक का बताया था।
  • स्थानीय लोगों ने विजयसिंह पथिक का नाम महात्मा रख दिया था।
  • विजयसिंह पथिक एक दिन प्रवचन दे रहे थे तब इनका प्रवचन साधु सीताराम दास ने सुना व इनसे बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व लेने को कहा था।
  • 1915 में विजयसिंह पथिक ने बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व शुरू किया था।
  • 1915 में विजयसिंह पथिक ने किसान पंच बोर्ड बनाया था। इसके प्रथम अध्यक्ष साधु सीताराम दास थे।
  • इसके पश्चात विजयसिंह पथिक ने कानपुर के “प्रताप” अखबार में बिजौलिया आन्दोलन की खबरे छपवाना शुरू कर दिया था।
  • विजयसिंह पथिक बिजौलिया आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर लेकर गये थे।
  • इसे बाद मराठा, अभ्युदय, भारतमित्र आदि अखबारों में भी इसकी खबर छपने लगी थी।
  • विजयसिंह पथिक महात्मा गाँधी से मिले थे। इसके पश्चात महात्मा गाँधी ने अपने सचिव महादेव देसाई को विजयसिंह के साथ बिजौलिया भेजा था।
  • 1917 में विजयसिंह पथिक ने उपरमाल पंचबोर्ड का गठन किया था। इसके अध्यक्ष मन्ना पटेल थे।
  • 1922 में राजपुताना का ए.जी.जी. राॅबर्ट हाॅलैण्ड बिजौलिया आये थे और किसानों और ठिकानेदार के मध्य समझौता करवाया था। इस समझौते में 35 कर लगने थे। यह समझौता स्थाई सिद्ध नहीं हुआ था।
  • 1922 में विजयसिंह पथिक स्वंय को इस आंदोलन से दूर कर लिया था।

तृतीय चरण (1923 से 1941) –

  • तृतीय चरण में सर्वप्रथम नेतृत्व माणिक्यलाल वर्मा ने किया था।
  • इनके पश्चात सीकर के जमनालाल बजाज ने इसका नेतृत्व किया था।
  • जमनालाल के पश्चात रामनारायण चौधरी ने नेतृत्व किया था।
  • तृतीय चरण में कई महिलाओं ने भी भाग लिया था। इस चरण में माणिक्यलाल वर्मा की पत्नी नारायणीदेवी वर्मा ने भी भाग लिया था।
  • इसमें रमा देवी,  रानी भीलनी व उदी मालन ने भी भाग लिया था।
  • 1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी. विजयराघवाचार्य ने अपने राजस्व मंत्री डा. मोहन सिंह मेहता को बिजौलिया भेजा था।
  • 1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी. विजयराघवाचार्यमाणिक्यलाल वर्मा के मध्य समझौता हुआ तथा किसान आन्दोलन समाप्त हो गया था।
  • इस समझौते में लगान की दरे कम कर दी, बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया था व अनेक लाग-बाग हटा दिये थे।
  • इस आंदोलन में तुलसी भील सन्देशवाहक का कार्य करते थे।

बेंगू किसान आन्दोलन (1921 से 1924 चित्तौड़गढ़) – 

  • बेंगू, मेवाड़ रियासत का ही एक स्थान था।
  • आन्दोलन के समय मेवाड़ के महाराणा फ़तेह सिंह थे।
  • बेंगू किसान आन्दोलन का नेतृत्व रामनारायण चैधरी ने किया था।
  • बेंगू किसान आन्दोलन मेनाल नामक स्थान से 1921 में प्रारम्भ हुआ था।
  • आन्दोलन के समय बेगू का ठिकानेदार अनूप सिह था।
  • 1923 में बेगू के ठिकानेदार अनूप सिह व किसानों के मध्य समझौता हुआ और इस समझौते में लगान की दर कम कर दी गयी थी।
  • मेवाड़ के शासक ने इस समझौते को मानने से इनकार कर दिया व इस समझौते को वोल्शेविक क्रान्ति का नाम दिया था।
  • इसके पश्चात मेवाड़ के शासक ने अनूप सिंह को हटा कर अमृत सिंह को ठिकानेदार बना दिया था।
  • 1923 में किसानों ने अमृत सिंह के विरुद्ध में गोविन्दपुरा गाँव में पुनः आन्दोलन कर शुरू दिया था।
  • राजा ने एक आयोग मिस्टर ट्रेन्च को गोविन्दपुरा भेजा था। 13 जुलाई 1923 में यहाँ मिस्टर ट्रेन्च के आदेश पर किसानों पर गोलियाँ चलाई गयी थी। इसमें रूपा जी कृपा जी मारे गये थे।
  • इसके पश्चात इस आन्दोलन में विजयसिंह पथिक ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया था। विजयसिंह पथिक को गिरफ़्तार कर लिया था  व इनको 5 साल की सज़ा दी गयी थी।
  • 1924 में लगान की दरें घटा कर कम कर दी गयी थी और बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया गया था। 1924 में यह आन्दोलन समाप्त हो गया था।

बूंदी/ बरड़ किसान आन्दोलन (1923 से 1943 तक) –

  • बूंदी किसान आन्दोलन का नेतृत्व पं. नयनूराम शर्मा ने किया था।
  • बूंदी किसान आन्दोलन को बरड़ किसान आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है।
  • बरड़ किसान आन्दोलन का नेतृत्व भवर लाल सोनी द्वारा किया गया था।
  • बूंदी रियासत एक मात्र एसी रियासत है जहाँ पर महिलाओं से भी बेगार लिया जाता था।
  • सर्वाधिक महिलाओं ने बूंदी किसान आंदोलन में भाग लिया था।
  • 2 अप्रैल 1923 को डाबी हत्याकाण्ड हुआ था।
  • किसानों की सभा पर पुलिस द्वारा गोलीबारी की गयी थी। इस गोलीबारी में नानक जी भील देवीलाल शहीद हो गये थे।
  • माणिक्य लाल वर्मा ने नानक जी भील की स्मृति में “अर्जी” गीत लिखा था।
  • 1943 में यह किसान आन्दोलन असफलता के कारण समाप्त हो गया था।
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